[5] तहिना जीह शरीरक एक छोटे अंग अछि, मुदा बात बहुत पैघ-पैघ बजैत घमण्ड करैत अछि। सोचू, नान्हिएटा आगिक लुत्ती कतेकटा वन मे आगि लगा दैत अछि। [6] जीह सेहो एक आगि अछि। अपना सभक शरीरक अंग सभ मे जीहे मे अधर्मक एक विशाल संसार भरल अछि। ई सम्पूर्ण शरीर केँ दुषित कऽ दैत अछि, आ नरकक आगि सँ पजरि कऽ अपना सभक सम्पूर्ण जीवनक गति मे आगि लगा दैत अछि। [7] सभ प्रकारक पशु-पक्षी, जमीन मे ससरऽ वला जीव-जन्तु, जल मे पाओल जाय वला जीव—सभ केँ मनुष्य द्वारा वश मे कयल जा सकैत अछि आ कयलो गेल अछि। [8] मुदा जीह केँ केओ वश मे नहि कऽ सकैत अछि। ई एक एहन अधलाह वस्तु अछि जे कखनो स्थिर नहि रहैत अछि। प्राण-घातक विष एकरा मे भरल छैक। [9] अपना सभ जीह द्वारा अपन प्रभु आ पिताक प्रशंसा करैत छियनि आ एही जीह द्वारा परमेश्वरक स्वरूप मे रचना कयल मनुष्य केँ सराप दैत छिऐक। [10] एके मुँह सँ प्रशंसा आ सराप दूनू निकलैत अछि। यौ हमर भाइ लोकनि, एना तँ होयबाक नहि चाही। [11] की पानिक झड़नाक एके मुँह सँ मिठाह पानि आ तिताह पानि, दूनू बहराइत अछि? [12] यौ हमर भाइ लोकनि, की अंजीरक गाछ पर जैतून फड़ि सकैत अछि वा अंगूरक लत्ती मे अंजीर? तहिना नूनियाह झड़नाक मुँह बाटे मिठाह पानि सेहो नहि बहरा सकैत अछि।
जे सभ अहाँ केँ सराप दैत अछि, तकरा सभ केँ आशीर्वाद दिऔक। जे सभ अहाँक संग दुर्व्यवहार करैत अछि, तकरा सभक लेल प्रभु सँ प्रार्थना करू।
मुदा हम अहाँ सभ केँ कहैत छी, जे केओ अपना भाय पर क्रोधो करत तकरा कचहरी मे दण्डक योग्य ठहराओल जयतैक। जे अपन भाय केँ ‘रे मूर्ख’ कहत, तकरा धर्म-महासभा मे ठाढ़ होमऽ पड़तैक, और जे केओ अपना भाय केँ सराप देत, से नरकक आगि मे खसयबा जोगरक अछि।
ओ दुष्टता सँ दूर रहय आ भलाइक काज करय, ओ पूरा मोन सँ सभक संग शान्ति सँ रहबाक कोशिश करय।
जे कोनो वस्तु मुँह मे जाइत अछि, से मनुष्य केँ अशुद्ध नहि करैत अछि, बल्कि जे मुँह सँ बहराइत अछि से ओकरा अशुद्ध करैत अछि।”
अहाँ सभ पर जे अत्याचार करय तकरा आशीर्वाद दिअ; हँ, आशीर्वाद दिअ, सराप नहि।
[10] यीशु भीड़क लोक केँ अपना लग बजा कऽ कहलथिन, “अहाँ सभ सुनू आ बुझू। [11] जे कोनो वस्तु मुँह मे जाइत अछि, से मनुष्य केँ अशुद्ध नहि करैत अछि, बल्कि जे मुँह सँ बहराइत अछि से ओकरा अशुद्ध करैत अछि।”
[8] मुदा जीह केँ केओ वश मे नहि कऽ सकैत अछि। ई एक एहन अधलाह वस्तु अछि जे कखनो स्थिर नहि रहैत अछि। प्राण-घातक विष एकरा मे भरल छैक। [9] अपना सभ जीह द्वारा अपन प्रभु आ पिताक प्रशंसा करैत छियनि आ एही जीह द्वारा परमेश्वरक स्वरूप मे रचना कयल मनुष्य केँ सराप दैत छिऐक। [10] एके मुँह सँ प्रशंसा आ सराप दूनू निकलैत अछि। यौ हमर भाइ लोकनि, एना तँ होयबाक नहि चाही।
[18] मुदा जे बात मुँह सँ बहराइत अछि से हृदय सँ निकलि कऽ अबैत अछि आ से मनुष्य केँ अशुद्ध बनबैत अछि। [19] कारण, हृदय सँ निकलैत अछि विभिन्न तरहक गलत विचार, हत्या, परस्त्रीगमन, अनैतिक शारीरिक सम्बन्ध, चोरी, झूठ गवाही, निन्दाक बात, [20] आ यैह बात सभ मनुष्य केँ अशुद्ध करैत अछि, नहि कि बिनु हाथ धोने भोजन करब, से।”
Maithili Bible 2010
2010 The Bible Society of India and Wycliffe Bible Translators, Inc